महाराष्ट्र के राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं जो जो केवल पड़ा या चुनावी जीत तक सीमित नहीं रहते बल्कि पूरे राजनीतिक वमर्श को प्रभावित करते रहे हैं। किसी को ऐसा कभी विश्वास ही नहीं था की अजीत पवार इतनी जल्दी लोगों को छोड़कर चले जाएंगे। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को जन जन तक पहुंचाने वालए इतनी जल्दी अलविदा हो जाएँगे ऐसा किसी को आभास तक नहीं था।
अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। उनकी विरासत और विकास कार्यों के कारण पुणे जिले की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। एनसीपी ने अब एक नई रणनीति के साथ चुनावी मैदान में उतरने का निर्णय लिया है, जिसमें अजित पवार के पुराने भाषणों और उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों के वीडियो के जरिए मतदाताओं से भावनात्मक जुड़ाव बनाने पर जोर दिया जा रहा है ।
अजित पवार की राजनीतिक यात्रा
अजित पवार का जन्म 22 मई 1959 को बारामती, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता अनंतराव पवार एक सामाजिक कार्यकर्ता थे, और उनके चाचा शरद पवार एक प्रसिद्ध राजनेता थे। अजित पवार ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बारामती से प्राप्त की और बाद में पुणे विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की
अजित पवार ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1982 में की, जब वे पुणे जिला सहकारी बैंक के निदेशक बने। इसके बाद, वे 1991 में बारामती लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर सांसद बने। 1995 में वे पहली बार बारामती विधानसभा से विधायक चुने गए और तब से वे लगातार इस सीट से जीतते आ रहे हैं।
मंत्री पद और उपमुख्यमंत्री पद
अजित पवार ने विभिन्न मंत्री पदों पर कार्य किया है, जिनमें जल संसाधन, ऊर्जा, और ग्रामीण विकास मंत्री शामिल हैं। वे 1999 से 2014 तक विभिन्न सरकारों में मंत्री रहे हैं। उन्होंने छह बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पद पर कार्य किया है, जो एक रिकॉर्ड है।
गठबंधन की रणनीति के माहिर
अजित पवार अपने काम की वजह से हर दल के करीब थे। महाराष्ट्र के विकास और जनता के हित के लिए वह हर काम करते थे जिससे महाराष्ट्र के हर एक व्यक्ति को लाभ मिल सके। अजीत पवार कांग्रेस के साथ तो काफी दिनों तक गठबंधन में रहे। लेकिन अपने धुर विरोधियों के साथ भी गठबंधन में आकर सरकार का हिस्सा बने और सत्ता में रहकर महाराष्ट्र के विकास के लिए प्रयासरत रहे। गठबंधन में रहकर सहयोगी पार्टी के साथ किस तरह से व्यवहार करना चाहिए अजीत पवार इसे भली-भांति जानते थे लिहाजा सहयोगी पार्टी कभी भी वह की स्थिति में नहीं रह पाते की अजीत परिवार के सहयोग के सथ-साथ साथ सम्मान भी रखते।
एनसीपी में विभाजन
2023 में, अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से बगावत कर दी और एनसीपी के एक गुट के साथ भाजपा-शिवसेना गठबंधन में शामिल हो गए। यह विभाजन महज अजीत पवार की जिद नहीं लेकिन शरद पवार की महत्वाकांक्षा के कारण हुई थी। पार्टी का हर एक कार्यकर्ता अजीत पवार के साथ चलकर नई सोच के साथ बढ़ रहा था लेकिन शरद पवार अजीत पवार के बजाय सुप्रिया सुले को पार्टी का कमान सपना चाहते थे जिससे अजीत पवार की नाराजगी छुपे तौर परह सही जाहिर होने लगी थी। इस विभाजन के बाद अजित पवार न बीजेपी का साथ दिया और वे उपमुख्यमंत्री बने और एनसीपी का नाम और सिंबल हासिल कर लिया ।
एनसीपी की भविष्य की रणनीति
एनसीपी के वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे ने कहा है कि पार्टी एनडीए के साथ पूरी मजबूती के साथ खड़ी है। उन्होंने शरद पवार को सीधा संदेश देते हुए कहा कि बाकियों को जो करना है, वे करें, लेकिन एनसीपी एनडीए के साथ है।
एनसीपी के संभावित नेता
अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी के संभावित नेताओं की चर्चा हो रही है। इनमें सुनेत्रा पवार, पार्थ पवार, प्रफुल्ल पटेल, और सुनील तटकरे के नाम शामिल हैं। सुनेत्रा पवार को इस पद के लिए एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है, जबकि पार्थ पवार को भी एक संभावित नेता के रूप में देखा जा रहा है । हालांकि सुनेत्रा पवार ने महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री का पद संभाल कर पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनी। सुनेत्रा पवार का राजनीतिक अनुभव बहुत ज्यादा दिनों का तो नहीं है लेकिन अजीत पवार की पत्नी के तौर पर परोक्ष रूप से राजनीति से दशकों से जुड़ी रही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में सुप्रिया सुले के खिलाफ बारामती से जरूर खड़ी थी लेकिन जीत नहीं मिलने की वजह से उन्हें राज्यसभा के जरिए संसद में पहुंचाया गया। अजीत पवार की विरासत वह कैसे संभालती हैं यह सब की निगाहें उन पर हैं।
अगर विश्लेषक की नजरिया से देखें तो अजीत पवार की पार्टी का शरद पवार की पार्टी में विलय होना लगभग लगभग तय है। अजीत पवार ही केवल एक नेता थे जो शरद पवार की विरोध के बावजूद महाराष्ट्र के सत्ता में काबिज हुए और पार्टी को काफी हद तक आगे भी बढ़ाया। अजीत पवार के निधन के बाद पार्टी के अन्य नेता सीधे-सीधे तौर पर यह कहते नजर आए कि दोनों पार्टियों का विलय होना तय था केवल आधिकारिक घोषणा की जानी थी। इससे यही जाहिर होता है कि दूसरे लीड के जो राजनेता है, वह शरद पवार की पावर पॉलिटिक्स से सहमे है डर है कि उनका राजनीतिक भविष्य ही खतरे में ना आ जाए। हालाकि कई और अजित पवार के पुराने साथी है लेकिन अजित पवार के नहीं रहने से कमजोर और मजबूर नजर आ रहे हैं जिससे शरद पवार के सामने विरोध ना कर समझौते के साथ सहयोग के रूप में आना ज्यादा है।
